डॉ. आंबेडकर और अनुच्छेद 370: ऐतिहासिक तथ्य, विवाद और वास्तविक भूमिका

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 लंबे समय तक राजनीतिक, संवैधानिक और वैचारिक बहस का केंद्र रहा है। अक्सर यह दावा किया जाता है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस अनुच्छेद का विरोध किया था और इसे उनकी इच्छा के विरुद्ध संविधान में शामिल किया गया। यह लेख इन्हीं दावों, ऐतिहासिक घटनाओं और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर एक विस्तृत, संतुलित और शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

डॉ. आंबेडकर और अनुच्छेद 370
डॉ. आंबेडकर और अनुच्छेद 370

अनुच्छेद 370 क्या था?:

अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अस्थायी रूप से विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया था। इसके अंतर्गत:

  • राज्य को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार मिला
  • भारतीय संसद के कानूनों की सीमित प्रयोज्यता तय की गई
  • रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे विषय केंद्र के अधिकार क्षेत्र में रखे गए

यह प्रावधान 1947–49 के असाधारण राजनीतिक और सुरक्षा हालात में लाया गया था।

डॉ. आंबेडकर की भूमिका: 

डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष और उस समय भारत के कानून मंत्री थे। आम तौर पर यह कहा जाता है कि:

  • आंबेडकर ने अनुच्छेद 370 के मसौदे को स्वयं तैयार नहीं किया
  • उन्होंने इस अनुच्छेद पर संविधान सभा में सक्रिय रूप से पक्ष नहीं रखा
  • जिस दिन अनुच्छेद 370 पर चर्चा हुई, उस दिन उन्होंने अन्य अनुच्छेदों पर तो भाग लिया, लेकिन इस विषय पर प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए

इन तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि आंबेडकर इस प्रावधान से सहमत नहीं थे या कम से कम इसके पक्ष में उत्साहित नहीं थे।

बलराज माधोक का कथन और शेख अब्दुल्ला से संवाद:

जनसंघ नेता बलराज माधोक द्वारा उद्धृत एक कथन के अनुसार, डॉ. आंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला से स्पष्ट शब्दों में कहा था:

“आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, सड़कों का निर्माण करे, अनाज की आपूर्ति करे और आपको भारत के समान दर्जा दे। लेकिन बदले में भारत सरकार के पास सीमित अधिकार हों और भारतीय नागरिकों को कश्मीर में कोई अधिकार न मिले—ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार करना भारत के हितों के विरुद्ध और विश्वासघात होगा।”

यह कथन आंबेडकर के संवैधानिक राष्ट्रवाद और समान नागरिक अधिकारों के सिद्धांत को दर्शाता है।

नेहरू, गोपालस्वामी अयंगार और पटेल की भूमिका:

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार:

  • शेख अब्दुल्ला ने आंबेडकर से असहमति के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संपर्क किया
  • नेहरू ने गोपालस्वामी अयंगार को जम्मू-कश्मीर से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का मसौदा तैयार करने का दायित्व दिया
  • अनुच्छेद 370 का प्रारूप गोपालस्वामी अयंगार द्वारा संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया
  • कहा जाता है कि जब यह अनुच्छेद पारित हुआ, उस समय नेहरू विदेश दौरे पर थे और सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रक्रिया को आगे बढ़ने दिया

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि अनुच्छेद 370 मुख्यतः कार्यपालिका और राजनीतिक नेतृत्व की पहल थी, न कि मसौदा समिति की सामूहिक सहमति।

क्या अनुच्छेद 370 आंबेडकर की सोच के विपरीत था?:

डॉ. आंबेडकर के विचारों का मूल आधार था:

  • एक राष्ट्र, एक संविधान
  • समान नागरिक अधिकार
  • कानून के समक्ष समानता

अनुच्छेद 370 इन सिद्धांतों से आंशिक रूप से अलग था, क्योंकि यह एक राज्य को विशेष संवैधानिक अपवाद देता था। यही कारण है कि कई विद्वान मानते हैं कि आंबेडकर वैचारिक रूप से इसके पक्ष में नहीं थे, भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका तीखा विरोध दर्ज न कराया हो।

बाद के वर्षों में अनुच्छेद 370 पर बहस

अनुच्छेद 370 को लेकर दशकों तक बहस चलती रही:

  • इसे राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक माना गया
  • कुछ वर्गों ने इसे कश्मीर के भारत में विलय की शर्त बताया
  • 2019 में इसे निष्प्रभावी (abrogate) कर दिया गया, जिससे यह बहस एक नए चरण में प्रवेश कर गई

अतः अनुच्छेद 370 का इतिहास जटिल, बहुस्तरीय और राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि:

  • डॉ. आंबेडकर इस अनुच्छेद के शिल्पकार नहीं थे
  • वे इसके वैचारिक आधार से सहमत नहीं थे
  • इसे मुख्यतः नेहरू सरकार और गोपालस्वामी अयंगार द्वारा आगे बढ़ाया गया

डॉ. आंबेडकर का संवैधानिक दृष्टिकोण समानता, एकरूपता और राष्ट्रीय हित पर आधारित था, और इसी कसौटी पर अनुच्छेद 370 को लेकर उनकी असहमति को समझा जा सकता है।

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