भारत को मानसिक गुलामी और सामाजिक भेदभाव से मुक्त करने का एक वैचारिक आह्वान!
हजारों वर्षों से भारतीय समाज जिस कुप्रथा की बेड़ियों में जकड़ा रहा है, वह है ‘जातिवाद’। यह न केवल एक सामाजिक विभाजन है, बल्कि मानवीय गरिमा और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का सबसे बड़ा शत्रु है। यह ई-पुस्तक “जातिवाद का विनाशक; सामाजिक सुधार” इसी गंभीर विषय पर एक गहन और साहसी विमर्श प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक की प्रमुख विशेषताएं:
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ऐतिहासिक विश्लेषण: यह ई-पुस्तक मे स्पष्ट किया है कि कैसे वैदिक काल में शुरू हुई कार्य-विशेषज्ञता धीरे-धीरे एक कठोर वर्णाश्रम व्यवस्था में बदल गई, जिसने व्यक्ति के जन्म के साथ ही उसका भाग्य, व्यवसाय और सामाजिक स्तर तय करना शुरू कर दिया।
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मानवाधिकार और आधुनिकता: यह पुस्तक आधुनिकता की कसौटी पर जातिवाद को परखती है और इसे मानवाधिकारों का घोर विरोधी सिद्ध करती है। यह दर्शाती है कि कैसे यह व्यवस्था व्यक्ति की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर उसे पिछड़ेपन की ओर धकेलती है।
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संवैधानिक और वैचारिक मार्ग: भारत के संविधान ने जातिवाद को अवैध घोषित किया है, लेकिन क्या मानसिक स्तर पर हम स्वतंत्र हुए हैं? यह पुस्तक बाबा साहब अंबेडकर और अन्य महान समाज सुधारकों के संघर्षों को केंद्र में रखकर बताती है कि कैसे बहुजन विचारधारा और शिक्षा के माध्यम से इस जहर को खत्म किया जा सकता है।
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युवा पीढ़ी और परिवर्तन: पुस्तक का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि यह वर्तमान युवा पीढ़ी में आ रहे बदलावों को रेखांकित करती है। जो युवा आज ज्ञान, शिक्षा और समानता को महत्व दे रहे हैं, वे ही इस जातिवाद के असली ‘विनाशक’ हैं।
यह पुस्तक हर उस पाठक के लिए है जो समाज में व्याप्त ऊंच-नीच को खत्म कर आपसी समरसता और समानता की विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहता है। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और समृद्ध समाज के निर्माण का ब्लूप्रिंट है।
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