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बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-1
डॉ. भीमराव आंबेडकर की पुस्तक “भारत में जातियाँ : उनका तंत्र, उद्गम और विकास” भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था का वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इस ग्रंथ में वे बताते हैं कि जाति कोई प्राकृतिक या ईश्वरीय व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक नियमों और ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है। आंबेडकर के अनुसार जाति का मूल आधार अंतर्विवाह (Endogamy) है, जिसने समाज को छोटे-छोटे बंद समूहों में बाँट दिया। यह व्यवस्था सामाजिक गतिशीलता, समानता और मानव गरिमा के विरुद्ध है। यह कृति जाति-विरोधी चिंतन की आधारशिला मानी जाती है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-2
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 2 उनके प्रारंभिक सामाजिक-राजनीतिक चिंतन को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है। इस खंड में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य शामिल है, जिसमें आंबेडकर ने दलितों और अल्पसंख्यकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ठोस माँग रखी। संघ बनाम स्वतंत्रता में वे व्यक्ति की स्वतंत्रता को सामाजिक संगठनों के वर्चस्व से ऊपर रखते हैं। सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय भारतीय राजनीति की जटिलताओं पर प्रकाश डालते हैं। भारत में छोटी जातियों की समस्या और उसका निवारण सामाजिक न्याय की दिशा सुझाता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-3
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 3 उनके विधायी, प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टिकोण को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। इस खंड में बजट पर चर्चा, वित्त अधिनियम संशोधन, और शिक्षा के लिए अनुदान जैसे विषय आंबेडकर की आर्थिक न्याय और शिक्षा-केन्द्रित सोच को दर्शाते हैं। बंबई विश्वविद्यालय, प्राथमिक शिक्षा, पुलिस, नगरपालिका और स्थानीय बोर्ड अधिनियमों से जुड़े संशोधन विधेयक उनके संस्थागत सुधारवादी दृष्टिकोण को उजागर करते हैं। साथ ही ग्राम पंचायत, अपराधी परिवीक्षा और मंत्रियों के वेतन जैसे विषय एक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी शासन की उनकी स्पष्ट अवधारणा को सामने लाते हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-4
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 4 बंबई प्रेसिडेंसी की शासन-व्यवस्था और दलित समाज से जुड़े मूलभूत प्रश्नों पर केन्द्रित है। इसमें प्रांत के क्षेत्र का पुनर्वितरण, प्रांतीय कार्यपालिका, विधायिका, स्वायत्तता और लोक सेवाओं जैसे विषयों के माध्यम से आंबेडकर एक लोकतांत्रिक और उत्तरदायी प्रशासन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। सिफारिशों का सारांश उनके व्यावहारिक और नीतिगत दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। इसके साथ ही दलित जातियों की शिक्षा, दलित हितों की रक्षा, तथा भारतीय सांविधिक आयोग और दलित वर्ग संबंधी भारतीय मताधिकार समिति के समक्ष रखे गए विचार सामाजिक न्याय और समान नागरिक अधिकारों की सशक्त वकालत करते हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-5
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 5 लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषणों पर आधारित है। इन भाषणों में आंबेडकर ने अछूतों/दलितों की सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर दृढ़ता से प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक सामाजिक समानता और मानव गरिमा सुनिश्चित न हो। पृथक प्रतिनिधित्व, मताधिकार और संवैधानिक संरक्षण की उनकी माँग दलित समाज के वास्तविक हितों की अभिव्यक्ति थी। यह खंड आंबेडकर को दलितों के निर्भीक प्रवक्ता और आधुनिक भारत के संवैधानिक चिंतक के रूप में स्थापित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-6
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 6 हिंदू धर्म और हिंदू सामाजिक व्यवस्था की गहन आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करता है। इसमें हिंदुत्व का दर्शन, भारत तथा साम्यवाद की पूर्वपीठिका, हिंदू समाज व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांत और उसकी अनूठी विशेषताएँ जैसे विषय शामिल हैं। आंबेडकर तर्कपूर्ण ढंग से स्पष्ट करते हैं कि हिंदू सामाजिक ढांचा समानता और बंधुत्व के विरुद्ध है। हिंदुत्व के प्रतीक के विश्लेषण के माध्यम से वे धार्मिक प्रतीकों के सामाजिक प्रभाव को उजागर करते हैं। यह खंड आंबेडकर के वैचारिक साहस और समाज-सुधारक दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-7
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 7 प्राचीन भारतीय इतिहास, धर्म और सामाजिक संरचना की तर्कसंगत एवं आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करता है। इसमें प्राचीन भारत के इतिहास, आर्यों की सामाजिक स्थिति, पुरोहितवाद की जड़ें और सुधारकों की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। बौद्ध धर्म के उत्थान-पतन, ब्राह्मण साहित्य, ब्राह्मणवाद की विजय और उससे उत्पन्न प्रतिक्रांति को आंबेडकर ऐतिहासिक दृष्टि से समझाते हैं। कृष्ण और गीता, हिंदू समाज के आधार-विचार, तथा शूद्र, नारी और प्रतिक्रांति जैसे विषय सामाजिक असमानता को उजागर करते हैं। बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स के माध्यम से वे वैकल्पिक मुक्ति-मार्गों पर विचार प्रस्तुत करते हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-8
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 8 – “हिन्दू धर्म की पहेलियाँ” हिंदू धर्मग्रंथों, परंपराओं और मान्यताओं की तार्किक तथा वैज्ञानिक समीक्षा प्रस्तुत करता है। इस कृति में आंबेडकर वेद, पुराण, स्मृतियों और धार्मिक प्रतीकों में निहित विरोधाभासों को प्रश्नों के रूप में सामने रखते हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि हिंदू धर्म की कई मान्यताएँ सामाजिक समानता और मानव गरिमा के सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं। यह खंड अंधश्रद्धा, कर्मकांड और जाति-आधारित भेदभाव पर गंभीर प्रश्न उठाता है तथा पाठकों को तर्क, विवेक और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से धर्म को समझने की प्रेरणा देता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-9
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 9 अस्पृश्यता की अवधारणा, उसके सामाजिक स्रोत और उसके दुष्परिणामों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें अस्पृश्यता की उत्पत्ति, संख्या, दासत्व से उसका संबंध तथा बस्तियों के सामाजिक बहिष्कार की विवेचना की गई है। दलित-उत्पीड़न के संदर्भ में आंबेडकर अस्पृश्यता और अराजकता के संबंध को स्पष्ट करते हैं तथा उसके औचित्य पर प्रश्न उठाते हैं। समस्या की जड़ों में वे हिंदू समाज में सार्वजनिक और सामाजिक विवेक के अभाव तथा जाति-आस्था को रेखांकित करते हैं। प्रशासनिक दृष्टिकोण, भेदभाव और अलग-थलग जीवन की समस्याओं पर चर्चा कर यह खंड अस्पृश्यों की मुक्ति का तार्किक मार्ग प्रस्तुत करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-10
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 10 सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर अस्पृश्यों की स्थिति का सशक्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है। सामाजिक खंड में वे समता बनाम अस्पृश्यता, हिंदू समाज की आधार-शिला और जाति-व्यवस्था के अभिशाप को उजागर करते हैं। राजनीतिक भाग में करोड़ों लोगों को नकारने की प्रवृत्ति, अस्पृश्यों का विद्रोह, गांधी और उनके उपवासों पर आलोचनात्मक दृष्टि तथा चेतावनी के स्वर दिखाई देते हैं। धार्मिक खंड में हिंदुओं से अलगाव, जाति-प्रथा और धर्म-परिवर्तन की अनिवार्यता तथा अस्पृश्यों के ईसाईकरण जैसे प्रश्न उठाए गए हैं। यह खंड दलित मुक्ति के लिए सामाजिक चेतना, राजनीतिक संघर्ष और धार्मिक विकल्प की स्पष्ट दिशा देता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-11
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 11 प्रांतीय वित्त व्यवस्था के उद्भव, विकास और संरचना का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था के विकास, साम्यवाद बनाम संघवाद तथा गैर-साम्राज्यवादी वित्त मॉडल पर विचार किया गया है। बजट के विकासक्रम में नियत बजट, निर्धारित राजस्व बजट और सांझा राजस्व बजट जैसी अवधारणाओं का विवेचन मिलता है। प्रांतीय वित्त की सीमाएँ, स्वरूप और विस्तार प्रशासनिक दृष्टि से स्पष्ट किए गए हैं। साथ ही भारत सरकार अधिनियम 1919 के अंतर्गत प्रांतीय वित्त में परिवर्तन की आवश्यकता, स्वरूप और आलोचना के माध्यम से आंबेडकर का आर्थिक-संवैधानिक चिंतन उभरकर सामने आता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-12
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 12 – “रुपए की समस्या : इसका उद्भव और समाधान” भारतीय मुद्रा प्रणाली का गहन आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस कृति में आंबेडकर ने रुपए के अवमूल्यन, चाँदी–सोने के मानक, विनिमय दर और मौद्रिक अस्थिरता के ऐतिहासिक कारणों की विवेचना की है। वे तर्कपूर्ण ढंग से बताते हैं कि गलत मौद्रिक नीतियाँ किस प्रकार आम जनता, श्रमिकों और किसानों को प्रभावित करती हैं। इस खंड में प्रस्तुत उनके सुझावों ने भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की वैचारिक नींव रखी। यह खंड आंबेडकर को एक दूरदर्शी अर्थशास्त्री के रूप में स्थापित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-13
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 13 शूद्रों की ऐतिहासिक स्थिति और उनकी सामाजिक अवनति की जड़ों का गहन, तर्कसंगत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें शूद्रों की उत्पत्ति से जुड़े ब्राह्मणवादी सिद्धांतों, आर्य–शूद्र संबंध, शूद्र बनाम आर्य तथा शूद्र और दास की अवधारणाओं की समीक्षा की गई है। आंबेडकर यह प्रश्न उठाते हैं कि शूद्र क्षत्रिय थे या नहीं और वर्ण व्यवस्था तीन थी या चार। ब्राह्मण बनाम शूद्र तथा शूद्रों का पतन जैसे विषय सामाजिक असमानता को उजागर करते हैं। यह खंड ऐतिहासिक मिथकों को चुनौती देकर शूद्रों की वास्तविक पहचान सामने लाता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-14
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का यह खंड 14 अस्पृश्यता (छुआछूत) की उत्पत्ति, विकास और सामाजिक प्रभावों का गहन ऐतिहासिक-तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें गैर-हिंदुओं और हिंदुओं में छुआछूत की स्थिति, अछूतों की बस्तियाँ गाँव के बाहर क्यों रहीं, तथा अलग बसाहट की सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला गया है। आंबेडकर छुआछूत की उत्पत्ति के पुराने और नए सिद्धांतों की समीक्षा करते हुए गोमांस-भक्षण, ब्राह्मणवाद और सामाजिक अपमान जैसे कारणों की विवेचना करते हैं। अंत में वे यह स्पष्ट करते हैं कि अछूत और अस्पृश्य कब और कैसे बने। यह खंड अस्पृश्यता को दैवी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक-सामाजिक उत्पीड़न का परिणाम सिद्ध करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-15
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 15 भारत–पाकिस्तान विभाजन, सांप्रदायिकता और राष्ट्र-निर्माण से जुड़े मूल प्रश्नों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें मुस्लिम लीग की माँगें, पाकिस्तान के विचार का उद्भव, हिंदू और मुस्लिम विकल्पों की पड़ताल तथा एकता के विघटन के कारणों पर तर्कपूर्ण चर्चा है। आंबेडकर पाकिस्तान के पक्ष-विपक्ष में दिए गए तर्कों, रक्षा-व्यवस्था की कमजोरियों और सांप्रदायिक शांति की चुनौतियों को उजागर करते हैं। वे पाकिस्तान की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्याधियों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए यह प्रश्न उठाते हैं कि पाकिस्तान बनना चाहिए या नहीं, और इस निर्णय का अधिकार किसे है। यह खंड आंबेडकर की दूरदर्शी राजनीतिक सोच को रेखांकित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-16
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 16 गांधी और अछूतों के प्रश्न को केंद्र में रखते हुए छुआछूत के औचित्य पर गहन शोधपरक सामग्री प्रस्तुत करता है। इस खंड में आंबेडकर भारतीय इतिहास की तथाकथित पवित्र और स्वर्णिम व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं तथा छुआछूत को सामाजिक, ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ में पुनः परखते हैं। वे पाठकों से आग्रह करते हैं कि वर्तमान सभ्यता और सामाजिक आवश्यकताओं के आलोक में इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखा जाए। यह खंड अंध-आस्था और स्थापित धारणाओं को चुनौती देकर तर्क, विवेक और सामाजिक न्याय पर आधारित सोच को मजबूत करता है तथा पाठक को इतिहास की आलोचनात्मक समझ विकसित करने की प्रेरणा देता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-17
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 17 गांधी और अछूतों के प्रश्न को केंद्र में रखते हुए छुआछूत के औचित्य पर गहन शोधपरक सामग्री प्रस्तुत करता है। इस खंड में आंबेडकर भारतीय इतिहास की तथाकथित पवित्र और स्वर्णिम व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं तथा छुआछूत को सामाजिक, ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ में पुनः परखते हैं। वे पाठकों से आग्रह करते हैं कि वर्तमान सभ्यता और सामाजिक आवश्यकताओं के आलोक में इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखा जाए। यह खंड अंध-आस्था और स्थापित धारणाओं को चुनौती देकर तर्क, विवेक और सामाजिक न्याय पर आधारित सोच को मजबूत करता है तथा पाठक को इतिहास की आलोचनात्मक समझ विकसित करने की प्रेरणा देता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-18
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 18 – “डॉ. आंबेडकर सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल में” उनके विधायी कार्यों और संसदीय योगदान का सजीव दस्तावेज है। इस खंड में सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल में दिए गए उनके भाषण, बहसें और हस्तक्षेप शामिल हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने श्रमिक अधिकारों, वित्तीय सुधारों, शिक्षा, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया। आंबेडकर ने कानून को सामाजिक परिवर्तन का औज़ार मानते हुए शोषित वर्गों की आवाज़ को सत्ता के केंद्र तक पहुँचाया। यह खंड उन्हें एक प्रखर सांसद, कुशल विधिवेत्ता और दूरदर्शी लोकतांत्रिक नेता के रूप में स्थापित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-19
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 19 अछूति जातियों की शिकायतों और सत्ता-हस्तांतरण से जुड़े ऐतिहासिक पत्र-व्यवहार का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस खंड के प्रथम भाग में राजनीतिक, शैक्षणिक और अन्य शिकायतों के माध्यम से पीड़ित वर्गों के प्रति सरकार के कर्तव्यों को रेखांकित किया गया है। द्वितीय भाग में सत्ता हस्तांतरण के संदर्भ में सर स्टैफर्ड क्रिप्स, मार्क्स ऑफ़ लिनलिथगो, लॉर्ड वेवेल, लॉर्ड पैथिक-लॉरेंस तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों के साथ आंबेडकर के पत्र और वक्तव्य शामिल हैं। यह खंड ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की ओर संक्रमणकाल में दलित हितों की संवैधानिक सुरक्षा के लिए आंबेडकर के सतत संघर्ष और दूरदर्शी राजनीति को उजागर करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-20
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 20 – “डॉ. आंबेडकर केंद्रीय विधानसभा में” उनके संसदीय जीवन और विधायी नेतृत्व का महत्वपूर्ण अभिलेख है। इस खंड में केंद्रीय विधानसभा में दिए गए उनके भाषण, प्रश्न, प्रस्ताव और बहसें संकलित हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने श्रमिकों, दलितों, महिलाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों की प्रभावी पैरवी की। वित्त, श्रम, शिक्षा, प्रशासन और संवैधानिक सुधारों पर उनके तर्क व्यावहारिक और दूरदर्शी थे। आंबेडकर ने लोकतांत्रिक संस्थाओं का उपयोग सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए किया। यह खंड उन्हें एक निडर जनप्रतिनिधि और संवैधानिक लोकतंत्र के सशक्त रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-21
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 21 – “डॉ. आंबेडकर केंद्रीय विधानसभा में (2)” उनके संसदीय जीवन और विधायी नेतृत्व का महत्वपूर्ण अभिलेख है। इस खंड में भी केंद्रीय विधानसभा में दिए गए उनके भाषण, प्रश्न, प्रस्ताव और बहसें संकलित हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने श्रमिकों, दलितों, महिलाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों की प्रभावी पैरवी की। वित्त, श्रम, शिक्षा, प्रशासन और संवैधानिक सुधारों पर उनके तर्क व्यावहारिक और दूरदर्शी थे। आंबेडकर ने लोकतांत्रिक संस्थाओं का उपयोग सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए किया। यह खंड भी उन्हें एक निडर जनप्रतिनिधि और संवैधानिक लोकतंत्र के सशक्त रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-22
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 22 – “बुद्ध और उनका धम्म” उनकी अंतिम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति है। इस ग्रंथ में डॉ. आंबेडकर ने भगवान बुद्ध के जीवन, संघर्ष और धम्म को तर्कसंगत, मानवीय और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने बुद्ध के धम्म को कर्मकांड, अंधविश्वास और ईश्वरवाद से मुक्त नैतिक दर्शन के रूप में व्याख्यायित किया, जिसका लक्ष्य करुणा, प्रज्ञा और समानता है। यह खंड सामाजिक क्रांति, मानव-मुक्ति और बौद्ध धम्म की आधुनिक व्याख्या का आधार स्तंभ है, जो शोषणमुक्त समाज की दिशा निर्धारित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-23
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 23 भारत के आर्थिक-राजनीतिक इतिहास और संवैधानिक विचारधारा का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें प्राचीन भारतीय वाणिज्य, मध्ययुग में भारत के व्यापारिक संबंध, इस्लाम का उदय एवं पश्चिमी यूरोप का विस्तार, तथा ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की स्थिति पर विचार किया गया है। आगे यह खंड अंग्रेजी संविधान की मूल अवधारणाओं, संसद, सम्राट, उच्च सदन और विधायी शक्तियों की व्याख्या करता है। साथ ही, रियासतों की स्वतंत्रता की मांग और ब्रिटिश शासन के प्रभावों का आलोचनात्मक अध्ययन करता है, जो भारत के आधुनिक राजनीतिक विकास को समझने में सहायक है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-24
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 24 कानून, प्रशासन और औपनिवेशिक शासन की बुनियादी संरचनाओं पर गहन विमर्श प्रस्तुत करता है। इस खंड में सामान्य विधि, औपनिवेशिक पद-व्यवस्था, विनिर्दिष्ट अनुतोष विधि तथा न्याय-प्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण लेख और टिप्पणियाँ सम्मिलित हैं। बाबासाहेब आंबेडकर ने इन विषयों के माध्यम से भारतीय इतिहास के तथाकथित स्वर्णयुग की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाया और शूद्रों व वंचित वर्गों की वास्तविक स्थिति को उजागर किया। यह खंड आज की सामाजिक-न्याय आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-25
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 25 ब्रिटिश भारत के संविधान, संसदीय प्रक्रिया और सामाजिक व्यवस्था के निर्माण से जुड़े गंभीर विश्लेषण को प्रस्तुत करता है। इस खंड में संसदीय कार्यप्रणाली पर टिप्पणियाँ तथा सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने से संबंधित महत्वपूर्ण वैचारिक लेख शामिल हैं। यह सामग्री न केवल राजनीति और कानून के विद्यार्थियों के लिए आधारभूत अध्ययन-स्रोत है, बल्कि समाज-निर्माण में रुचि रखने वाले सजग नागरिकों के लिए भी चिंतन का सशक्त आधार प्रदान करती है। लोकतंत्र, उत्तरदायित्व और सामाजिक न्याय की समझ को गहरा करने में यह खंड विशेष रूप से उपयोगी और प्रेरक है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-26
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 26 ऐतिहासिक दस्तावेज “ड्राफ्ट संविधान : भारत के राजपत्र में प्रकाशित (26 फरवरी 1948)” से संबंधित शोधपूर्ण सामग्री को प्रस्तुत करता है। इस खंड में संविधान निर्माण की वैचारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों का गहन विश्लेषण मिलता है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय इतिहास के तथाकथित स्वर्णयुग की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए वंचित, शोषित और अछूत वर्गों के अधिकारों को केंद्र में रखा। आज की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में यह खंड पाठकों को संविधान और इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने के लिए प्रेरित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-27
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 27 “ड्राफ्ट संविधान : खंड-प्रतिखंड चर्चा (9 दिसंबर 1946 से 31 जुलाई 1947)” पर आधारित शोधपूर्ण सामग्री को प्रस्तुत करता है। इस खंड में संविधान सभा की बहसों, तर्कों और निर्णयों के माध्यम से भारतीय संविधान के निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया को उजागर किया गया है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय इतिहास के तथाकथित स्वर्णयुग और सामाजिक असमानताओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए अछूतों और वंचित वर्गों के अधिकारों को केंद्र में रखा। वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं के संदर्भ में यह खंड पाठकों को संविधान और इतिहास को नए, तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-28
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 28 “ड्राफ्ट संविधान : भाग 2 खंड-5 चर्चा (16 मई 1949 से 16 जून 1949)” पर आधारित शोधपूर्ण सामग्री को प्रस्तुत करता है। इस खंड में संविधान सभा की बहसों, तर्कों और निर्णयों के माध्यम से भारतीय संविधान के निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया को उजागर किया गया है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीय इतिहास के तथाकथित स्वर्णयुग और सामाजिक असमानताओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए अछूतों और वंचित वर्गों के अधिकारों को केंद्र में रखा। वर्तमान सामाजिक आवश्यकताओं के संदर्भ में यह खंड पाठकों को संविधान और इतिहास को नए, तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-29
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 29 भारत के गौरवशाली इतिहास और संविधान निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसमें "प्रारूप संविधान : भाग II (खंड-6) (30 जुलाई 1949 से 16 सितंबर 1949)"को संकलित किया गया है। यह समाज निर्माण में रुचि रखने वाले जागरूक नागरिकों के लिए भी चिंतन का एक सशक्त आधार है। इसमें शामिल ऐतिहासिक तथ्य और चर्चाएं पाठकों को भारतीय लोकतंत्र की नींव और वैचारिक गहराई से परिचित कराती हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-30
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 30 एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज “ड्राफ्ट संविधान : भाग–2 (खंड 7) (17 सितंबर 1949 से 16 नवंबर 1949)” को प्रस्तुत करता है। इस खंड में संविधान सभा की अंतिम और निर्णायक बहसें संकलित हैं, जहाँ भारतीय संविधान के मूल स्वरूप को अंतिम रूप दिया गया। डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक न्याय, समानता, मौलिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों पर गहन तर्क रखे। यह खंड संविधान निर्माण की वैचारिक गंभीरता, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और वंचित वर्गों के प्रति संवेदनशील दृष्टि को उजागर करता है, जिससे पाठक संविधान की आत्मा को समझ पाते हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-31
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 31 भारतीय समाज-सुधार के इतिहास में एक निर्णायक दस्तावेज है, जो हिंदू कोड विधेयक से संबंधित बहसों, मसौदों और संसदीय प्रक्रियाओं को समेटे हुए है। इस खंड में हिंदू विवाह, संयुक्त परिवार की संपत्ति, उत्तराधिकार, स्त्री के संपत्ति अधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषयों पर डॉ. आंबेडकर की प्रगतिशील दृष्टि स्पष्ट होती है। यह खंड समानता, लैंगिक न्याय और सामाजिक लोकतंत्र की उनकी अवधारणा को उजागर करता है। परंपरागत असमानताओं को तोड़ने के उनके प्रयासों और प्रतिरोध के बीच चले संघर्ष को समझने के लिए यह खंड अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-32
डॉ. भीमराव आंबेडकर के 'सम्पूर्ण वाङ्मय' का खंड 32 मुख्यतः "हिंदू संहिता (हिंदू कोड)" से संबंधित ऐतिहासिक बहसों, प्रारूपों और संसदीय चर्चाओं का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस खंड में हिंदू संहिता विधेयक के विभिन्न चरण, उसकी प्रयोज्यता, धारा–धारा विश्लेषण तथा संयुक्त समिति में हुई खंड-प्रतिखंड चर्चा शामिल है। डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत हिंदू कोड सामाजिक समानता, स्त्री अधिकार, संपत्ति में न्याय और जाति-आधारित असमानताओं को समाप्त करने का साहसिक प्रयास था। यह खंड भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ को रेखांकित करता है और विधि, समाज तथा लोकतांत्रिक संघर्ष की गहरी समझ प्रदान करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-33
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 33 स्वतंत्र भारत की विधायी और संसदीय प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस खंड में दंड विधि, दंड प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, संसद एवं राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन, उच्चतम न्यायालय, नागरिक अधिकार, सामाजिक सुधार तथा संविधान संशोधन से जुड़े अनेक विधेयकों पर हुई चर्चाएँ और प्रस्ताव संकलित हैं। डॉ. आंबेडकर ने इन विधेयकों के माध्यम से न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया। यह खंड दर्शाता है कि वे केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि कानून, प्रशासन और लोकतांत्रिक शासन के गहरे चिंतक और प्रभावी विधि-निर्माता भी थे।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-34
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 34 उनके केन्द्रीय मंत्री तथा विधिवेत्ता के रूप में किए गए विधायी, प्रशासनिक और संवैधानिक कार्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस खंड में निर्वाचन व्यवस्था, चुनाव कानून, सामाजिक-धार्मिक सुधार, अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े विषय, न्यायपालिका, उच्च न्यायालय, अपीलीय संस्थाएँ, बजट, अंतर्राष्ट्रीय स्थिति तथा विविध विधेयकों पर उनके विचार और हस्तक्षेप संकलित हैं। यह खंड डॉ. आंबेडकर की व्यावहारिक राजनीति, कानून निर्माण की दृष्टि और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ करने के उनके प्रयासों को स्पष्ट करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-35
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय' का खंड 35 उनके क्रांतिकारी जीवन और वैचारिक संघर्षों का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। यह खंड मुख्य रूप से डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुई बैठकों और उनके बीच के गंभीर वैचारिक संवादों पर केंद्रित है। इसमें कालाराम मंदिर सत्याग्रह (नासिक) और मंदिर प्रवेश आंदोलनों का विस्तार से वर्णन है, जहाँ बाबासाहेब ने स्पष्ट किया था कि मंदिर प्रवेश से अधिक महत्वपूर्ण आर्थिक और शैक्षणिक सुधार हैं। इस खंड में स्वतंत्र लेबर पार्टी की भूमिका, 'भूमि पुत्रों' के प्रति अन्याय, और जाति प्रथा के समूल विनाश जैसे विषयों पर उनके प्रखर विचार संकलित हैं। यह पुस्तक दलित वर्गों को राजनीतिक मंच प्रदान करने और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला रखने में उनके योगदान को दर्शाती है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-36
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 36 राष्ट्र-निर्माण और लोकतंत्र की आधारशिला से जुड़े उनके गंभीर वैचारिक चिंतन को प्रस्तुत करता है। इस खंड में प्रांतीय स्वायत्तता, निर्वाचन प्रणाली, वयस्क मताधिकार, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता तथा राजनीतिक चेतना जैसे मूल प्रश्नों पर डॉ. आंबेडकर के तर्कपूर्ण विचार संकलित हैं। कांग्रेस, गांधी, ब्रिटिश नीति और समकालीन राजनीतिक संकटों पर उनकी स्पष्ट दृष्टि भी इसमें दिखाई देती है। यह खंड दर्शाता है कि डॉ. आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जिम्मेदार नागरिकता का सशक्त माध्यम था।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-37
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 37 संघर्ष, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक चेतना का सशक्त घोषणापत्र है। इस खंड में व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और राजनीतिक अधिकारों पर आधारित उनके प्रेरक विचार संकलित हैं। वयस्क मताधिकार, उपयुक्त प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुरक्षा और सामाजिक-राजनीतिक सुधार की प्राथमिकता पर उनका स्पष्ट आग्रह दिखाई देता है। डॉ. आंबेडकर जनता को भाग्य और दैवी शक्ति के भरोसे रहने के बजाय संघर्ष, संगठन और जागरूकता की राह अपनाने का संदेश देते हैं। यह खंड विशेषतः वंचित वर्गों को शक्ति, सम्मान और न्यायपूर्ण भविष्य के लिए संघर्ष की प्रेरणा प्रदान करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-38
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 38 सामाजिक जागरण, आत्मसम्मान और संगठित संघर्ष का प्रखर दस्तावेज़ है। इस खंड में जन्माधारित श्रेष्ठता, जातिगत पवित्रता और असमानता के सिद्धांतों की कठोर आलोचना की गई है। डॉ. आंबेडकर अछूतों को अपने उद्धार के लिए स्वयं कर्म करने, निर्भय व स्वाभिमानी बनने तथा अधिकारों की रक्षा हेतु सजग रहने का आह्वान करते हैं। सत्याग्रह, संगठन, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को वे उन्नति की आधारशिला मानते हैं। यह खंड विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका, सामाजिक कर्तव्य और जागृति की ज्योति को बुझने न देने का प्रेरक संदेश देता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-39
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 39 सामाजिक चेतना, वैचारिक स्पष्टता और आत्मसम्मान की भावना को सुदृढ़ करने वाला महत्वपूर्ण खंड है। इसमें डॉ. आंबेडकर समाज की रूढ़ मान्यताओं, अंधविश्वासों और अन्यायपूर्ण परंपराओं पर तीखा प्रहार करते हैं। वे तर्क, विवेक और वैज्ञानिक सोच को सामाजिक प्रगति का आधार मानते हैं तथा शोषित-वंचित वर्गों को संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। यह खंड व्यक्ति को आत्मनिर्भर, निर्भीक और जागरूक नागरिक बनने का संदेश देता है तथा सामाजिक परिवर्तन की दिशा में वैचारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खंड-40
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्पूर्ण वाङ्मय का खंड 40 राजनीतिक चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और आत्मसम्मान की वैचारिक घोषणा है। इस खंड में डॉ. आंबेडकर जनता को राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग होने, सत्ता और समाज दोनों में अन्याय का प्रतिरोध करने का आह्वान करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि केवल भावनात्मक नारे नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष, विवेकपूर्ण राजनीति और नैतिक साहस ही परिवर्तन ला सकते हैं। यह खंड शोषित वर्गों को निर्भीक होकर सवाल उठाने, लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने और अपने भविष्य का निर्माण स्वयं करने की प्रेरणा देता है।

हिन्दू कोड बिल
हिन्दू कोड बिल का लक्ष्य भारतीय समाज में पारिवारिक और सामाजिक न्याय की स्थापना करना था। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में प्रचलित असमान और भेदभावपूर्ण परंपराओं को समाप्त कर कानून के माध्यम से समानता सुनिश्चित करना था। इस विधेयक द्वारा विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक और संपत्ति के अधिकारों को सुव्यवस्थित किया गया। विशेष रूप से महिलाओं को समान कानूनी अधिकार देना इसका केंद्रीय लक्ष्य था, ताकि वे पारिवारिक संपत्ति और निर्णयों में पुरुषों के बराबर स्थान पा सकें। डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में यह बिल सामाजिक सुधार, लैंगिक समानता और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।

भारत का संविधान
भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है, जो 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है। संविधान देश की शासन व्यवस्था, नागरिकों के मौलिक अधिकार, कर्तव्य और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को स्पष्ट करता है। यह समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों पर आधारित है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में गठित संविधान सभा ने इसे तैयार किया। भारत का संविधान विविधता में एकता को बनाए रखते हुए सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।