भारतीय इतिहास में 14 अप्रैल 1891 वह स्वर्णिम दिन है, जिसने सदियों से अज्ञानता और अन्याय के अंधकार में डूबे समाज के लिए एक नया सवेरा लाया। इसी दिन हमारे मार्गदर्शक और भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म हुआ। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि संघर्षों की एक ऐसी महागाथा है जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी।

बचपन और छुआछूत का दंश:
बाबा साहब का बालमन उन सवालों से जूझता था जिनका जवाब उस समय के समाज के पास नहीं था।स्कूल में उन्हें कमरे के बाहर बैठना पड़ता था और प्यास लगने पर पानी पीने के लिए किसी और का इंतज़ार करना पड़ता था क्योंकि उन्हें खुद पानी छूने की अनुमति नहीं थी। ये अपमानजनक अनुभव ही आगे चलकर उनके संकल्प की शक्ति बने।
उच्च शिक्षा और डिग्रियों का विशाल भंडार:
डॉ. अंबेडकर ने यह साबित किया कि शिक्षा ही वह अस्त्र है जो गुलामी की बेड़ियां काट सकता है। 1912 में बी.ए. करने के बाद, उन्होंने बड़ौदा महाराज की छात्रवृत्ति से अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी में शिक्षा प्राप्त की।
बाबा साहब केवल एक वकील या राजनीतिज्ञ नहीं थे, बल्कि वे अपने समय के सबसे शिक्षित भारतीयों में से एक थे। उन्होंने विश्व के प्रसिद्ध संस्थानों से निम्नलिखित डिग्रियां हासिल की थीं:
- उन्होंने अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी से राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, मानव शास्त्र, अर्थ शास्त्र, समाज विज्ञान और कानून जैसे विषयों में विशेषज्ञता प्राप्त की।
- उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों में A., M.Sc., D.Sc., Ph.D., L.L.D., D.Lit. और Barrister-at-Law जैसी प्रतिष्ठित डिग्रियां शामिल थीं।
अपमान के विरुद्ध महासंकल्प:
इतनी उच्च शिक्षा और बड़ौदा रियासत में ‘रक्षा सचिव’ जैसे पद पर होने के बावजूद छुआछूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्हें रहने के लिए कमरा नहीं मिला, दफ्तर में उनके पैर के नीचे से कालीन हटा लिए जाते थे और चपरासी फाइलें दूर से फेंकते थे। इन घटनाओं ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि यदि एक उच्च अधिकारी के साथ ऐसा हो रहा है, तो अनपढ़ और गरीब समाज का क्या हाल होगा? तब उन्होंने संकल्प लिया:
“मैं अपने समाज के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करके ही रहूँगा, यदि मैं ऐसा न कर सका तो स्वयं को गोली मार लूँगा।”
सामाजिक क्रांति के मुख्य पड़ाव:
बाबा साहब ने अपने विचारों को फैलाने के लिए ‘मूकनायक’ अखबार शुरू किया और ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ बनाई। उनके कुछ प्रमुख आंदोलन निम्नलिखित हैं:
- महाड़ का चवदार तालाब आंदोलन (1927):अछूतों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का हक दिलाने के लिए।
- कालाराम मंदिर प्रवेश:इंसानी गरिमा की लड़ाई के लिए।
- मनु-स्मृति विद्रोह:गुलामी के प्रतीकों के विरुद्ध विद्रोह।
वायसराय की कार्यसाधक कौंसिल में लेबर मैम्बर के रूप में बाबा साहब ने मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए ऐतिहासिक कार्य किए:
- उन्होंने मजदूरों के काम करने के घंटों को 12 से घटाकर 8 घंटे करवाया।
- उन्होंने ‘न्यूनतम मजदूरी कानून’ पास करवाया और ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता दिलाई।
- महिला कर्मचारियों के लिए उन्होंने ‘बिना वेतन काटे प्रसूति अवकाश’ (Maternity Leave) और कर्मचारियों के लिए ‘अनिवार्य बीमा योजना’ लागू करवाई।
गांधी जी के साथ वैचारिक मतभेद और पूना पैक्ट:
अछूतों के राजनीतिक अधिकारों के लिए बाबा साहब ने लंदन में गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। जब ब्रिटिश सरकार ने दलितों को ‘अलग मतदान’ का अधिकार दिया, तो गांधी जी ने इसके खिलाफ यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। अंततः, दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए 1932 में ‘पूना पैक्ट’ हुआ, जिसे बाबा साहब ने एक मजबूरी में किया गया समझौता माना।
हिंदू धर्म की व्यवस्था पर उनके विचार
बाबा साहब ने हिंदू धर्म की जातिगत व्यवस्था को एक बहुमंजिला मीनार की तरह बताया था, जिसमें:
- एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने का कोई रास्ता नहीं है।
- जो व्यक्ति जिस मंजिल (जाति) पर पैदा होता है, उसे उसी में मरना पड़ता है; चाहे वह कितना ही योग्य क्यों न हो, वह ऊपर नहीं जा सकता।
- इसी कारण उन्होंने कहा था कि “मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ यह मेरे बस में नहीं था, लेकिन मैं हिंदू मरूँगा नहीं”।
धर्म परिवर्तन और बौद्ध धम्म:
बाबा साहब का मानना था कि जो धर्म इंसान को नीच ठहराए और शिक्षा से वंचित रखे, वह धर्म नहीं पाखंड है। उन्होंने ‘अत्त दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) के सिद्धांत को अपनाते हुए 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में 10 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म ग्रहण किया।
आधुनिक भारत के निर्माता:
बाबा साहब केवल दलितों के नेता नहीं थे, बल्कि वे पूरे भारत के भविष्यद्रष्टा थे:
- मजदूरों के मसीहा:उन्होंने काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किए, न्यूनतम मजदूरी कानून और कर्मचारी बीमा योजना लागू करवाई।
- महिला अधिकार:महिला कर्मचारियों को प्रसूति अवकाश (Maternity Leave) दिलवाया।
- संविधान निर्माण:प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की कड़ी मेहनत से भारत का संविधान तैयार किया।
प्रमुख शिक्षण संस्थानों की स्थापना:
शिक्षा के महत्व को समझते हुए उन्होंने दलित छात्रों के लिए कई हॉस्टल और कॉलेज शुरू किए, जिनमें प्रमुख हैं:
- People Education Society.
- Sidharth College of Arts and Science और Sidharth College of Law.
- Milind College, Aurangabad.
हमारा दायित्व:
6 दिसंबर 1956 को बाबा साहब चिरनिद्रा में सो गए, लेकिन वे हमें एक ऐसा सशक्त समाज बनाने का मंत्र दे गए जो शिक्षा और संगठन पर आधारित हो। अपने मिशन के लिए उन्होंने अपने चार बच्चे और अपनी पत्नी को खो दिया, लेकिन करोड़ों वंचितों के भविष्य को उज्ज्वल कर दिया।
आज हमारा कर्तव्य है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलें और एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का वास हो ।

