अक्सर यह देखा जाता है कि विभिन्न धर्मों के संस्थापक अपने संदेश को ईश्वरीय बताते हैं। जैसे गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को ईश्वर घोषित करते हैं और गीता को भगवान के वचन माना जाता है। उसी प्रकार ईसा ने स्वयं को ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया। इसके विपरीत, तथागत बुद्ध ने अपने लिए ऐसा कोई दावा कभी नहीं किया। उन्होंने न तो स्वयं को ईश्वर का पुत्र कहा, न ही अपनी शिक्षाओं को ईश्वरीय आदेश बताया।
बुद्ध ने केवल इतना कहा था कि वे भी उन असंख्य मनुष्यों में से एक हैं, जो प्रकृतिक रूप से जन्म लेते है। उनकी शिक्षाएं मनुष्य द्वारा मनुष्य के लिए दी गई शिक्षाएं हैं जो पूर्णतः अनुभव आधारित है।
वे अपने संदेश को कभी भी अंतिम या त्रुटिरहित बताने का दावा नहीं करते। उन्होंने तो यह खुली चुनौती दी कि जो भी व्यक्ति चाहे, वह उनकी प्रत्येक बात की जांच करे, उसे परखें और सत्य को स्वयं खोजे।
दुनिया के अन्य किसी धर्म के संस्थापक ने अपनी शिक्षाओं को इस तरह स्वतंत्र रूप से परखे जाने की अनुमति नहीं दी।

बुद्ध के धम्म को लेकर फैलते भ्रम
समस्या यह है कि भारत सहित विश्व में बुद्ध की शिक्षाओं को लेकर अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। समय-समय पर विभिन्न मत, परंपराएँ और व्यक्तिगत व्याख्याएँ उभरती रही हैं, जिससे धम्म के मूल स्वरूप पर भ्रम बढ़ता गया। यहाँ तक कि बौद्ध धम्म के विद्यार्थियों और विभिन्न परंपराओं के अनुयायियों के बीच भी एकरूपता नहीं दिखती।
कुछ के लिए बुद्ध की मुख्य शिक्षा समाधि है, कुछ के लिए विपश्यना।
कुछ के लिए बौद्ध धम्म केवल दीक्षित व्यक्तियों का धर्म है; वहीं कुछ इसे लोकधर्म रूप में देखते हैं।
किसी के लिए यह दर्शन है, तो किसी के लिए रहस्यवाद।
कुछ लोग इसे संसार से पलायन का मार्ग मानते हैं, जबकि कुछ इसे केवल भिक्षा-निर्भर जीवन समझ लेते हैं।
कई लोगों के अनुसार धम्म हृदय की भावनाओं का दमन है, जबकि कुछ इसे सुख-दुख से परे स्थिति मानते हैं।
इस तरह की अस्पष्ट और विविध धारणा प्रायः अज्ञानवश उत्पन्न होती है। साथ ही कुछ विरोधी तत्व जानबूझकर धम्म के बारे में भ्रांतियाँ फैलाते हैं, क्योंकि उन्हें भय होता है कि बौद्ध धम्म की जागरूकता उनके संकीर्ण विचारों और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को चुनौती दे सकती है।
बुद्ध की वास्तविक शिक्षाएँ क्या हैं?
यह प्रश्न बहुत बड़ा है और इसे समझने के लिए धम्म को उसकी मूल अवस्था में देखना आवश्यक है। बुद्ध की शिक्षाएँ न तो रहस्यवाद हैं, न कर्मकांड, न अंधविश्वास और न ही किसी ईश्वरीय आदेश की घोषणा।
वे तो मानवीय पीड़ा, उसके कारणों, और उससे मुक्ति के व्यावहारिक मार्ग की शिक्षा हैं।
बुद्ध का धम्म जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है—जैसा कि मनुष्य प्रत्यक्ष रूप मे अनुभव करता है।
धम्म हमें यह सिखाता है कि;
-अपने भीतर शांति और करुणा का विकास कैसे करें?
-क्रोध, लोभ, द्वेष और भ्रम से मुक्ति कैसे पाएं?
-समाज में सामंजस्य, समता और न्याय कैसे स्थापित हो?
-दुःख के कारणों को पहचानकर जीवन को बेहतर कैसे बनाया जाए?
बुद्ध का धम्म किसी विशेष वर्ग, जाति या समुदाय के लिए सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक मानव के लिए समान रूप से उपलब्ध एक व्यावहारिक मार्ग है।
धम्म अनुभव है, अंधविश्वास नहीं
बुद्ध ने न तो अपने को दैवीय बताया और न ही अपनी शिक्षाओं को अंतिम सत्य घोषित किया। उन्होंने बस इतना कहा कि— “मैंने जो समझा है, वह मुक्ति का सत्य मार्ग प्रतीत होता है। तुम स्वयं जांचकर जान लो।”
इसीलिए धम्म का वास्तविक स्वरूप प्रयोग, अनुभव और निरीक्षण पर आधारित है।

