बौद्ध धम्म: चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और पंचशील का व्यावहारिक मार्गदर्शन
भूमिका: बौद्ध धम्म की ओर बढ़ता मानव समाज
आज के समय में लोगों के बीच बौद्ध धर्म को जानने और समझने की रुचि तेजी से बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप समाज में एक नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया जा रहा है। यह ऊर्जा मानव-मानव के बीच मैत्री, समानता, समरसता और मानवता के भाव को मजबूत कर रही है। यह सब संभव हो पा रहा है बौद्ध धम्म के ज्ञान और उसकी शिक्षाओं के प्रभाव से, जो व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ पूरे समाज को सही दिशा देता है।
बौद्ध धम्म क्या है? (What is Buddhism)
बौद्ध धर्म मूल रूप से सुखी, शांत और समृद्ध जीवन जीने का एक व्यावहारिक मार्ग है। इसकी संचालन लगभग 2500 वर्ष पूर्व भारत में भगवान गौतम बुद्ध द्वारा की गई थी।
बौद्ध धम्म का उद्देश्य—
जीवन के दुखों को समझना
दुखों के कारणों को पहचानना
दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखाना
चार आर्य सत्य (Four Noble Truths in Buddhism)
बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ मुख्य रूप से चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग पर आधारित हैं। संसार के चार आर्य सत्य है जो इस प्रकार है।
दुःख (Dukkha): संसार में दुःख, पीड़ा, असंतोष है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, और मृत्यु ये सभी दुःख की अवस्था है।
दुःख का कारण (Samudaya): इस दुःख का कारण है। दुःख का कारण इच्छा, तृष्णा और संलग्नता हैं। जिसके कारण हम जो चाहते हैं, वह अक्सर दुःख और असंतोष का कारण बनता है।
दुःख का निवारण (Nirodha): दुःख का अंत (निवारण) संभव है। अगर हम अपनी इच्छाओं, तृष्णाओ और संलग्नताओं को समाप्त कर देते हैं, तो हम सभी दुःखों से मुक्त हो सकते हैं।
दुःख से मुक्ति का मार्ग (Magga): दुःख से मुक्ति पाने के लिए एक विशेष मार्ग है, जिसे “अष्टांगिक मार्ग” कहा जाता है।
अष्टांगिक मार्ग: सही जीवन जीने की कला
यह अष्टांगिक मार्ग (आठ प्रकार के मार्ग) एक व्यवस्थित जीवन जीने की दिशा में आठ कदम हैं जो व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक शुद्धता की ओर अग्रसर करते हैं; जो निम्न है।
सम्यक दृष्टि: जीवन के सत्य को समझना, जैसे चार आर्य सत्य और कर्मफल का सिद्धांत।
सम्यक संकल्प: सभी बुरे कर्मों, विकारों, और गलत सोच से बचना और शुद्ध और अच्छे संकल्प रखना।
सम्यक वचन: सत्य बोलना, झूठ, अपशब्द और गाली से बचना।
सम्यक कर्म: अच्छे कार्य करना, अहिंसा का पालन करना।
सम्यक आजीविका: किसी भी अनैतिक कार्य व व्यवसाय से बचना और सही तरीके से जीवन यापन करना।
सम्यक प्रयास: अच्छे मानसिक और शारीरिक गुणों का विकास करना, अच्छे कर्म करने और बुराई से बचने के लिए प्रयास करना।
सम्यक ध्यान: सही ज्ञान की जागरूकता, ध्यान और समर्पण का अभ्यास करना।
सम्यक समाधि: सही ध्यान विधि से मानसिक एकाग्रता और शांति प्राप्त करना।
बौद्ध धर्म का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
बौद्ध धर्म ने भारतीय समाज और संस्कृति पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है। इस धर्म ने अहिंसा, करुणा, समानता, और शांति के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के दो भाग है; पहला जो भिक्षु का जीवन ग्रहण करते है और दूसरा जो आम जनता का जीवन जिन्हे उपासक कहा जाता है। ये दोनों समाज में अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अनुशासन और साधना पर जोर देते हैं। बौद्ध धम्म मे स्त्री और पुरुष दोनों ही भिक्षु बन सकते है और जीवन के सभी संस्कारो का प्रयोजन कर सकते है और करवा भी सकते है।
बौद्ध धर्म जीवन के सत्य को समझने और सुखी जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसकी शिक्षा ने न केवल भारत में बल्कि पूरे एशिया में गहरा प्रभाव डाला है जो आज भी यह दुनिया भर में अरबों लोगों के लिए अच्छे मार्गदर्शन और शांति का स्रोत है। बौद्ध धर्म ने लोगों के जीवन में बदलाव के रास्ते खोले। इस धर्म की शिक्षाएँ मानवता, अहिंसा, त्याग, और सद्भावना को प्रोत्साहित करती हैं, जो समाज में शांति, समरसता, और प्रेम को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बुद्ध वंदना और त्रिशरण मंत्र
भगवान बुद्ध की उपासना उनके श्रद्धावान भिक्षुओ और उपासकों द्वारा की जाती है। जो भगवान बुद्ध को अपने गुरु और मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करते है और उन्हें आदर और श्रद्धा के साथ वंदन भी करते हैं।
बुद्ध वंदना मंत्र
बुद्ध धम्म के उपासको को चाहिए कि प्रतिदिन सुबह और शाम के समय नित्य कार्यो को निपटा कर किसी निकट के बौद्ध विहार मे, या अपने घर मे, अथवा बाहर किसी उपयुक्त एकान्त स्थान मे बैठ कर भगवान बुद्ध का स्मरण करना चहिए। सबसे पहले भगवान बुद्ध को (हो सके तो) पुष्प-धूप-दीप आदि अर्पण करे तथा इस मन्त्र का तीन बार पाठ करते हुए भगवान बुद्ध को प्रणाम करना चाहिए।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स।
मै उन भगवान अरहत सम्यक सम्बुद्ध को प्रणाम करता हूँ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स।
मै उन भगवान अरहत सम्यक सम्बुद्ध को प्रणाम करता हूँ।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स।
मै उन भगवान अरहत सम्यक सम्बुद्ध को प्रणाम करता हूँ।
इसके बाद त्रिशरण मन्त्रो का पाठ करते हुए भगवान बुद्ध का ध्यान करना चहिए।
त्रिशरण: स्वयं की जागृति और अनुशासन की स्वीकृति
बुद्धं सरणं गच्छामि।
धम्मं सरणं गच्छामि।
संघं सरणं गच्छामि।
अर्थ:
मै बुद्ध की शरण मे जाता हूँ।
मै धम्म की शरण मे जाता हूँ।
मै संघ की शरण मे जाता हूँ।
दुतियम्पि, बुद्धं सरणं गच्छामि।
दुतियम्पि, धम्मं सरणं गच्छामि।
दुतियम्पि, संघं सरणं गच्छामि।
अर्थ;
दुसरी बार भी, मै बुद्ध की शरण मे जाता हूँ।
दुसरी बार भी, मै धम्म की शरण मे जाता हूँ।
दुसरी बार भी, मै संघ की शरण मे जाता हूँ।
ततियम्पि, बुद्धं सरणं गच्छामि।
ततियम्पि, धम्मं सरणं गच्छामि।
ततियम्पि, संघं सरणं गच्छामि।
अर्थ;
तीसरी बार भी, मै बुद्ध की शरण मे जाता हूँ।
तीसरी बार भी, मै धम्म की शरण मे जाता हूँ।
तीसरी बार भी, मै संघ की शरण मे जाता हूँ।
बौद्धो, गृहस्थो और उपासको को आगे दिए गए पंचशील का पाठ करना चाहिए और दैनिक जीवन में इन शीलों का पालन भी करना चाहिए।
पंचशील: नैतिक और सामाजिक जीवन का आधार:
भगवान बुद्ध द्वारा बताया गया पाँच मुख्य नियम जो उपदेश के रूप में पंचशील का सिद्धांत कहलाता है। ये पाच मुख्य शिक्षाएँ जो सभी के लिए पालन करना जरूरी है, वह चाहे भिक्खू हो या भिक्खुनी, चाहे उपासक हो या आम आदमी, स्त्री हो या पुरुष, सभी को इन पंचशील नियमो का पालन करना अनिवार्य होता है। यह एक आदर्श जीवन शैली का आधार रखता है जो सभी लोगों को सामाजिक, नैतिक, और आध्यात्मिक सुधार की दिशा में प्रोत्साहित करता है। पंचशील बौद्ध धम्म के अनुयायियों द्वारा अनुसरणीय और प्रयोग करने योग्य सामाजिक और नैतिक मूल्यों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। इससे उन्हें समझने और अपने जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।
पंचशील के पाँच मुख्य सिद्धांत (नियम) इस प्रकार हैं।
पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै प्राणी हिंसा (हत्या, मार-पीट) से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै चोरी से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै पर-स्त्री गमन (पर-पुरुष गमन#) वेश्या गमन आदि दुराचारो से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ। (यदि कोई महिला या स्त्री पंचशील का पाठ करे तो यहाँ “पर-पुरुष गमन” शब्द प्रयोग मे लाया जाता है।)
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै झूठ बोलने से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
सुरामेरय मज्जपमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै जुआ शराब आदि नशीली चीजों का सेवन तथा प्रमाद के कारणो से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
ऊपर बताए गए त्रिशरण और पंचशील पाठ करना (ग्रहण करना) बौद्ध धम्म का दीक्षा-विधि भी है। और यह बौद्धो, गृहस्थो और उपासको के लिए पालन करने योग्य शील भी है। उपरोक्त पंचशील में अन्य और पांच शील मिलाकर “दस शील” बनता है। जो धम्म दीक्षा देते समय दस शील के रूप मे ग्रहण भी किये जाते है।
दस शील और विशेष उपासना दिवस
प्रत्येक महीने के विशेष चार दिन “अष्टमी, अमावस्या एवं पूर्णिमा” के दिन सद्गृहस्थो को जब अपने दैनिक कार्यों से छुट्टी रहे तब पंचशील के साथ साथ निम्नलिखित और पाँच शील (सिद्धान्त) मिलाकर पाठ करना चहिए। और अपने दैनिक जीवन मे कड़ाई से पालन भी करना चाहिए।
पिसुनाय वाचाय वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै चुगली करने से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
फरुसाय वाचाय वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै कटु (कङवा) वचन बोलने से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
सम्फप्पलापा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै व्यर्थ के वचन बोलने से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
अभिज्झाय वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै लोभ लालच से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
व्यापादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मै क्रोध नही करने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
बुद्ध धम्म – आज के युग की आवश्यकता
बौद्ध धम्म केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला दर्शन है। आज के तनावपूर्ण और हिंसक समय में बुद्ध की शिक्षाएँ मानवता, शांति, समता और समानता की मजबूत नींव रखती हैं। यदि भारत को पुनः विश्वगुरु बनना है, तो बुद्ध धम्म को अंगीकार करते की बुद्ध की शिक्षाओं का पुनर्जीवन और अनुशरण अनिवार्य है।


