बुद्ध का धम्म क्या है?

आज के इस आधुनिक भारत में धर्म को लेकर जिस तरह का वातावरण बना हुआ है, जहाँ हर कोई अपने धर्म को इंसानियत से ऊपर मानकर उसे दूसरे से अच्छा और पुरातन सिद्ध करने में लगा है- उससे बौद्ध धर्म (बुद्ध का धम्म) भी अछूता नहीं रह पाया है। इसका दुखद परिणाम यह है कि भगवान बुद्ध और उनके मार्ग को मानने वाले अनेक लोग, जाने-अनजाने में, गलत और मिलावटी जानकारी को साझा कर रहे हैं। दूसरी ओर, बुद्ध के धम्म को गलत सिद्ध करने के लिए कुछ लोग दिन-रात एक किए हुए हैं। ऐसे में, यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि हम बुद्ध के धम्म की सही किताबों को गहराई से पढ़ें और समझें, क्योंकि बुद्ध और उनके धर्म से जुड़े हुए एक-एक वाक्य और हर एक शब्द का बहुत व्यापक अर्थ है।

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जानकारी की शुद्धता और मिलावट का प्रश्न:

बुद्ध के धम्म की सही किताबें सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हैं और अधिकांश लोगों तक उनकी पहुँच नहीं है। जो अन्य किताबें उपलब्ध हैं, उनमें तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों की भर-भर के मिलावट है। थोड़ी सी भी बुद्धि का प्रयोग करने पर यह मिलावट आसानी से पहचानी जा सकती है। इसलिए, बुद्ध या बौद्ध धर्म की किताबों से कोई भी जानकारी पढ़ते या साझा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए: कही यह जानकारी मिलावटी तो नहीं है? सही और सटीक जानकारी को समझने के लिए, बुद्ध के समय की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, भौगोलिक स्थिति की जानकारी के साथ-साथ उस समय की लिपि और भाषा को जानना भी अति आवश्यक है।

बुद्ध: संस्थापक नहीं, प्रवर्तक हैं:

हम सभी यह जानते हैं कि भगवान बुद्ध के मार्ग को बौद्ध धर्म कहा जाता है, लेकिन सही अर्थों में भगवान बुद्ध ने किसी भी ‘धर्म’ की शुरुआत नहीं की। वे बौद्ध धर्म के संस्थापक नहीं हैं, बल्कि प्रवर्तक हैं।

बोधि (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति

सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे जब पूर्ण ज्ञान (बोधि) की प्राप्ति हुई, तब वे बुद्धत्व को भी प्राप्त कर लिए।
यह ज्ञान कोई सामान्य ज्ञान नहीं है।
यह प्रकृति का वह ज्ञान है जो मानव को स्वयं द्वारा किए हुए  कर्तव्यों के माध्यम से अपने इसी जीवन में जीते जी सुख और दुःख का निर्धारण करने में सहायता करता है। यह ज्ञान व्यक्ति को स्वयं के प्रयास द्वारा निर्वाण को भी प्राप्त करने की क्षमता देता है।‘बुद्ध’ की उपाधि उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है, जो प्रकृति में मौजूद पूर्ण ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

धर्म चक्र प्रवर्तन (धम्म चक्क पबत्तन)

बौद्ध धर्म की पुस्तकों के अनुसार, भगवान गौतम बुद्ध अट्ठाइसवें बुद्ध हैं। इनसे पहले 27 बुद्ध हो चुके हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और विदेशी आगंतुकों के यात्रा विवरणों से भी इस बात की पुष्टि होती है। ज्ञान प्राप्ति के बाद, भगवान बुद्ध सबसे पहले वाराणसी के इसिपत्तन मिगदाय (सारनाथ) पहुँचे। उन्होंने अपने पाँच साथियों को, जिन्होंने उन्हें तपस्या के समय छोड़ दिया था, उन्हें ही धम्म का ज्ञान दिया और उन्हें शिक्षित किया। यह घटना ‘धम्म चक्क पबत्तन’ (धर्म चक्र प्रवर्तन) कहलाई, जिसका अर्थ है: “धर्म को फिर से संचालन (प्रवर्तित) करना।”
इसी प्रकार, सभी 27 बुद्धों ने अपने समय में धर्म चक्र प्रवर्तन किया है। इसलिए, भगवान बुद्ध को बौद्ध धर्म का प्रवर्तक (पुनःसंचालन कर्ता) कहा जाता है, संस्थापक नहीं।

वह केवल मार्ग दाता हैं

अन्य सभी धर्मों का कोई-न-कोई संस्थापक जरूर है, जो स्वयं को ईश्वर, ईश्वर की संतान, दूत या विशेष व्यक्ति घोषित करता है। लेकिन बुद्ध एक ऐसे व्यक्तित्व है जिन्होने स्वयं को सभी प्राणियों की तरह अपने माता पिता का प्रकृतिक संतान कहा। उन्होने सभी को यह भी कहा की वह कोई मोक्ष दाता नहीं है – वह केवल मार्ग दाता हैं।  

बुद्ध का धम्म: एक सरल और कल्याणकारी मार्ग

इस प्रकार, बुद्ध का धम्म वह मार्ग है जो मानव के जीवन को सरल, सत्यपरक, सम्पूर्ण, सुखी और सन्मार्ग पर ले जाता है। इस धम्म में मनुष्यों के साथ-साथ अन्य प्राणियों के साथ भी प्रेम, दया, करुणा, मैत्री की भावना जागृत होती है। इसमे सभी मनुष्य एक समान हैं और सभी को सभी प्रकार का अधिकार है। किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है। स्त्री और पुरुष, सभी को धम्म में बराबरी का अधिकार है।

बुद्ध के धम्म की शिक्षाओ का महत्व

इस धम्म की शिक्षाए सभी प्राणियों के लिए आदि में कल्याणकारी (शुरुआत में), मध्य में कल्याणकारी (मार्ग में) और और अंत में भी कल्याणकारी (परिणाम में) है। यह धम्म किसी आस्था का नहीं, बल्कि प्रकृति के पूर्ण ज्ञान पर आधारित कल्याणकारी मार्ग है, जिसे स्वयं के प्रयासों से प्राप्त किया जा सकता है। 

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